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मुंबई आतंकवादी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद की पार्टी जमात-उद-दावा अगले साल पाकिस्तान में होने वाले आम चुनाव में शामिल होगी। खुद सईद ने इसका एलान किया है। उसने यह भी कहा है कि 2018 कश्मीर की आजादी की मांग करने वालों के नाम है।

मिल्ली मुस्लिम लीग के बैनर तले लड़ेगा चुनाव

– न्यूज एजेंसी के मुताबिक, सईद ने कहा कि उसकी पार्टी जमात-उद-दावा 2018 में होने वाले आम चुनाव में मिल्ली मुस्लिम लीग के बैनर तले भाग लेगी।

– उसने यहां यहां चाउबुर्जी में जमात-उद-दावा के हेड ऑफिस में कहा, “मिल्ली मुस्लिम लीग अगले साल आम चुनाव में उतरने का प्लान बना रही है। मैं भी 2018 को उन कश्मीरियों के नाम करता हूं जो आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।”

PAK को भी हिदायत
– सईद ने कहा कि मैं भारत को बताना चाहता हूं कि मैं कश्मीरियों का सपोर्ट करना जारी रखूंगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वहां

क्या परेशानियां हैं। भारत चाहता है कि हम कश्मीरियों के लिए आवाज उठाना बंद कर दें। वह पाकिस्तान सरकार पर दबाव बना रहा है।

मैं पाकिस्तान को बताना चहता हूं कि पर्दे के पीछे से जारी डिप्लोमैसी ने सिर्फ कश्मीर के मुद्दे को नुकसान पहुंचाया है।

EC का पार्टी को मान्यता देने से इनकार
– बता दें कि जमात-उद-दावा ने अगस्त में मिल्ली मुस्लिम लीग पार्टी बनाई थी। हालांकि, पाकिस्तान के इलेक्शन कमीशन (ईसी) इसे पॉलिटिकल पार्टी के तौर पर मान्यता देने से दो बार इनकार कर चुका है।
– हालांकि, कहा जा रहा है कि सईद की पार्टी को मान्यता नहीं भी मिली तो वह निर्दलीय या किसी दूसरी पार्टी से चुनाव लड़ सकता है।

24 नवंबर को रिहा गया था सईद
– सईद को पाकिस्तान सरकार ने इस साल जनवरी से नजरबंद किया था।
– उसे आगे किसी दूसरे मामले में नजरबंद न करने का फैसला किया गया था। इसके बाद सईद को 24 नवंबर को नजरबंदी से रिहा कर दिया गया था।

सईद UN की ब्लैक लिस्ट में शामिल
– सईद मुंबई में नवंबर 2008 में किए गए आतंकी हमले का मास्टरमाइंड है। इस हमले में 166 लोगों की मौत हो गई थी।
– उसे यूनाइटेड नेशंस ने यूएन सिक्युरिटी काउंसिल रिजोल्यूशन 1267 के तहत दिसंबर 2008 में ब्लैक लिस्टेड किया था।
– अमेरिका ने भी उसे ग्लोबल टेररिस्ट डिक्लेयर किया है और उसके सिर पर एक करोड़ डॉलर का इनाम रखा है।

 

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गुजरात विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई. पहले चरण के मतदान में अब पांच दिन का वक्त बचा है. ऐसे में राजनीतिक दल चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में पूरी ताकत झोंके हुए हैं. इसी सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज एक बार फिर गुजरात दौरे पर हैं.

अपने चुनावी कार्यक्रम के तहत पीएम मोदी सबसे पहले भरूच पहुंचे. इस दौरान पीएम मोदी ने गुजराती भाषा में अपनी स्पीच की शुरुआत की. यहां पीएम ने सबसे पहले यूपी निकाय चुनाव में बीजेपी की जीत और कांग्रेस के खराब प्रदर्शन पर टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि यूपी पंडित जवाहरलाल नेहरू, मोती लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी की कर्मभूमि रही, लेकिन निकाय चुनाव में उनकी क्या हालत हुई, ये सबने देखा.

इसके बाद अपने भाषण के दौरान पीएम मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी पर भी सवाल उठाए. मोदी ने कहा, ‘इंदिरा गांधी खुद को गुजरात की बेटी कहती थीं और राजीव गांधी खुद को गुजरात का बेटा कहते थे. उन्हें बताना चाहिए कि वो किस अस्पताल में पैदा हुए थे?’

पीएम मोदी ने ये भी कहा कि भरूच और कच्छ जिले में मुस्लिमों की काफी आबादी है और यहां भी बीजेपी के शासन में तेजी से विकास कार्य हुए हैं. इन दो जिलों के नाम काफी ऊपर आते हैं.

पीएम मोदी इसके बाद सुरेंद्रनगर में रैली करेंगे. साथ ही वो श्री स्वामी नारायण गुरुकुल विश्विद्या प्रतिष्ठान के कार्यक्रम में भी शिरकत करेंगे. वहीं शाम में वो राजकोट में रैली करेंगे.

चुनाव प्रचार के इस अंतिम दौर में एक तरफ जहां पीएम मोदी जनता के बीच जाकर अपनी सरकार की उपलब्धियां गिना रहे हैं, वहीं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी पूरी ताकत झोंकी हुई है. पीएम की रैली के 2 दिन बाद राहुल फिर से गुजरात जा रहे हैं. कांग्रेस उपाध्यक्ष 5 और 6 दिसंबर को रैलियां करेंगे. इससे पहले पीएम मोदी के पिछले गुजरात दौरे के बाद राहुल गांधी बिना किसी पूर्वनियोजित कार्यक्रम के गुजरात पहुंच गए थे.

बता दें कि गुजरात में दो चरण में मतदान होना है. पहले चरण के लिए 9 दिसंबर और दूसरे चरण के लिए 14 दिसंबर को वोटिंग होगी. वोटों की गिनती 18 दिसंबर को होगी.

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गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान में अब सिर्फ 5 दिन ही बचे हैं. पहले दौर में 89 सीटों पर 9 दिसंबर को और दूसरे दौर में 93 सीटों पर 14 दिसंबर को मतदान होगा. अभी तक के चुनाव प्रचार में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बीजेपी को हर मोर्चे पर कड़ी टक्कर देने की कोशिश की है. राहुल के तीखे सवालों ने बीजेपी के लिए परेशानी जरूर खड़ी है वह रोज पीएम मोदी से सवाल पूछ रहे हैं. वहीं दूसरी ओर उन्होंने बीजेपी को हराने के लिए जातिगत घेराबंदी भी इस बार तगड़ी की है. लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस के सामने अभी बड़ी चुनौतियां हैं.
मतदान में 5 दिन, कांग्रेस के सामने हैं ये 10 चुनौतियां
  1. केंद्र की राजनीति में आने से पहले अपने तीन बार के शासनकाल में पीएम मोदी ने गुजरात के अंदर अपनी व्यक्तिगत छवि एक मजबूत क्षेत्रीय नेता के तौर पर कर चुके हैं. क्या राहुल गांधी का आक्रामक चुनाव प्रचार और उनके साथ जुड़े जातिगत आंदोलनों के तीनों नेता इस छवि को तोड़ पाने में कामयाब हो पाएंगे.
  2. हाल ही में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में हद से ज्यादा उलझे जातिगत समीकरणों को पीछे छोड़ते हुए प्रचंड बहुमत हासिल किया है. इसके पीछे भी बहुत हद तक पीएम मोदी की ही छवि है. यूपी निकाय चुनाव में भी बीजेपी को ही जीत मिली है तो क्या इसका असर राहुल गांधी या कांग्रेस कम कर पाएगी.
  3. यह नहीं भूलना चाहिए कि नरेंद्र मोदी खुद भी गुजरात से आते हैं. वह इन 2 दिनों में ही 7 रैलियां कर डालेंगे. पीएम मोदी हर रैली में गुजराती में बोलते हैं और गुजराती अस्मिता की बात करते हैं. इस समय देश के सबसे बड़े नेता के तौर पर मोदी वोट मांगेंगे तो हो सकता है अचानक उठा ‘भावनात्मक ज्वार’ सारे मुद्दों को गौण कर दे. कांग्रेस को यह लड़ाई अंतिम समय तक बिना थके लड़ने होगी.
  4. गुजरात मॉडल में कितनी भी बुराइयां हों लेकिन इसको यह कहकर पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है कि गुजरात में कुछ भी नहीं हुआ है.
  5. विकास के मुद्दे पर शुरू हुआ प्रचार ‘जातिवाद’ से ‘जनेऊ’ के जाल में आकर फंस गया है. अब बीजेपी ने बहुत आसानी से इसे मोदी बनाम राहुल बना रही है. कांग्रेस भी अपने मंच से सीधे नरेंद्र मोदी को ही खारिज कर रही है. कहीं यह कांग्रेस के लिए भारी न पड़ जाए.
  6. कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि 2007 के विधानसभा से पहले भी बिजली के मुद्दे पर सीएम रहते मोदी ने बड़ा आंदोलन झेला था. संघ से जुड़े संगठन भारतीय किसान संघ ने भी विरोध प्रदर्शन किया था. उस समय कई पाटीदार नेता भी मोदी के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किए हुए थे. उस गुस्से के आगे जीएसटी को लेकर हुई नाराजगी कुछ भी नहीं है.
  7. 2007 के विधानसभा चुनाव में भी मोदी ने पटेलों और क्षत्रियों की नाराजगी झेलते हुए जीत दर्ज की थी क्योंकि उस समय तक वह गुजराती जनमानस के बीच अपनी खुद की छवि गढ़ चुके थे. कांग्रेस ने जिन समीकरणों का सहारा ले रही है वह कितना कारगर होगी यह गौर करने वाली बात होगी.
  8. गुजरात में दलित वर्ग के बीच बीजेपी को लेकर नाराजगी जरूर है. हाल ही में जो घटनाएं हुई हैं उनका असर कितना पड़ा होगा यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन उन्हीं घटनाओं को लेकर हुए विरोध के बीच ही बीजेपी ने कांग्रेस को निकाय चुनाव में पराजित किया है.
  9. कांग्रेस को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि संघ से जुड़े कई संगठन और एनजीओ आदिवासियों और दलितों के बीच काम करते रहते हैं. जो बीजेपी के लिए दिन रात प्रचार कर रहे हैं.
  10. गुजरात में बीजेपी के पास कार्यकर्ताओं की एक बड़ी फौज है. उसने हर कार्यकर्ता को पन्ना प्रमुख बना रखा है. बूथ मैनेजमेंट में कांग्रेस को 24 घंटे मेहनत करनी होगी. रैलियों में जो भीड़ आ रही है उसे बूथ तक कैसे पहुंचाया जाए इसके लिए कांग्रेस को ‘परिश्रम की पराकाष्ठा’ करने होगी.

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The ruling party for 22 years, the Bharatiya Janata Party, says it is about development. This is apparently a copyrighted word and development is something only the BJP can deliver, particularly under Narendra Modi. What the BJP does is development and what other parties do is corruption, dynasty and so on. This formulation is childish in its simplicity but the remarkable thing is that the BJP has been allowed to get away with it by its opponents.

Even if we assume that what the BJP wants to talk about is development, meaning the discussing data and policies that push economic and social growth, the party gets distracted. It wants to know what religion Rahul Gandhi is. The prime minister lies and says the Congress celebrated Hafiz Saeed’s bail. What does that have to do with development? Nothing, of course.

If the BJP claims to stand for development, the Congress is not clear about the issue in the election. Or at least it does not offer a single point like the BJP claims to offer development. The Congress party’s crown prince Rahul Gandhi wants to discuss corruption in the Rafale deal (for which he has got no support from the media) one day, and the next day it could be GST and demonetisation. This lack of focus has meant that the messaging against the BJP has been scattered.

The second thing, after issues, is organisation. Here the BJP is a formidable force. It is one of the most powerful political parties in the democratic world. It has a large grassroots presence that is managed by the Rashtriya Swayamsevak Sangh, the world’s biggest non-governmental organisation, with lakhs of members. These are dedicated and trained individuals, and in recent years they have also been highly motivated because of the charismatic leadership of Narendra Modi, whom the RSS grassroots adores. In any tight race, and one is not sure whether Gujarat is a tight race at the moment, the BJP’s organisational assets will win the day for them.

On the other side, and since this is a two-party state we can only look at the Congress, it must be accepted that this level of competence is missing. The old Congress worker from the Seva Dal or the Youth Congress is absent. The structure has disintegrated and it is left to the individual Congress candidates to provide the manpower that will do the work. This costs money and many Congress leaders no longer invest as much money in elections because the party has been consistently losing.

Both on the side of issues and organisation, my view is that the BJP is ahead, either because of its strength or the Congress’ weakness, or both.

The third thing is the campaign strategy. The BJP has used its most powerful card, the prime minister, and has deployed him in dozens of rallies. Readers may have observed that though for many years he would only use Hindi even in Gujarat, but these days he has started speaking in Gujarati.

To me this indicates that he feels he needs to drive home the message and that may mean a closer race than the opinion polls show. Modi is of course an outstanding public speaker and he is able to set the agenda in a way that Rahul Gandhi cannot.

When Modi makes a big speech, he usually frames an old issue in a new way so well that the headlines must report it. An example: I sold tea, but did not sell the nation. Such clear, simple framing is a terrific asset to have in a leader. On the other hand, the Congress not only cannot set the agenda but must also keep defending itself on non-stories, such as whether Ahmed Patel was wrong to be a trustee in a hospital and whether Rahul Gandhi is Catholic.

The Congress has, however, managed to do one thing with competence: It has brought in the three large dissenting groups that had mobilised in the past few months. The Patidars, the Dalits and the OBC Kshatriyas, led by Hardik Patel, Jignesh Mewani and Alpesh Thakor, respectively. It would not have been easy to do this, given that the three groups have contradicting demands. And it would not have been natural for these groups to align with Congress given that all three mobilisations were apolitical and spontaneous, but the Congress has managed to pull it off. My guess is that this is the doing mainly of Ahmed Patel.

The BJP is worried by this development, and we can observe that in the many statements from its leaders, particularly the chief minister, which are aimed at breaking the alliance.

The question is: Will it be enough to defeat the BJP? My view is that this election will be determined above all by turnout. Gujarat is a high turnout state and the BJP, even if it leads opinion polls, must ensure that its base comes out and votes. This may not be easy because it is fighting a defensive campaign. The Congress can be confident that, even though its base is smaller, their voters will turn out because they are angry.

In that sense the real issues in Gujarat, jobs and meaningful economic development, are against the ruling party, even if it pretends to be fighting on them.

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When it comes to UP civic polls, Lucknow is one of the most sought after seat. And on an expected note, all the parties are giving their 100 per cent in order to make sure that they won the battle.

India Inside News tried to get the feel of this prestigious seat, taking into consideration all the factors such as the profile of the candidate, mood of the voters, issues that are going to have the final say and of course the campaign methodologies.

Traditionally, BJP has dominated this seat, but if the publicity barometer is anything to go by, Samajwadi Party candidate Meera Vardhan is certainly way ahead.

Meera Vardhan is married to the grandson of Acharya Narendra Dev. She seems very active in the campaign and as a result, she is getting tremendous exposure in the media, be it, print, electronic, online and social.

With regard to voters perspective, Meera Vardhan looks well researched.  In majority of gathering, Meera Vardhan speak up on issues that are relevant to Lucknow alongside the good work that is being done by previous Samajwadi Party government under Akhilesh Yadav.

In comparison to other candidates that are in the fray, the overall persona of Meera Vardhan is very calm and therefore not much of a surprise that she connects with the voters with utmost ease.

Another important thing that is there to be seen is the fact that BJP is not going all out in the campaign. Buzz is missing in the BJP camp and that is certainly going to help Meera Vardhan.

You may ask at this juncture: Why BJP is going so ‘soft’? The answer of this question is quite straightforward. It can be overconfidence, as BJP always perform well in Lucknow. Furthermore, the candidate of BSP and Congress (who was not able to decide the candidate till the last moment) are not expected to give the fierce fight.

All this makes this upcoming Lucknow battle a two way fight between BJP and SP’s Meera Vardhan. Going by the current scenario, Meera Vardhan holds the upper hand.