राजनीति

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The Bharatiya Janata Party’s chief ministerial candidate in Himachal Pradesh, Prem Kumar Dhumal, 73, said in an interview that his top priority would be restoring law and order, which, he alleged, has taken a turn for the worse over the past five year under a Congress government headed by Virbhadra Singh.

“I have to protect life, property and honour of the people. This is my top priority,” he said over phone on his way back from Prime Minister Narendra Modi’s election rally in Una. Dhumal, who specifically mentioned the need to “protect the dignity of women” said the state had its share of young police officers who are currently “side-lined” and will help him do this.

Dhumal predicted that the BJP would win more than 60 seats in the 68- member assembly; the party’s target is 50-plus he added. The election is scheduled for 9 November. “With PM Modi holding election rallies all over the State, the mood of public is such that the Congress will be wiped out. The Virbhadra regime is a symbol of corruption and mis-governance and people have decided to uproot it,” he said.

Dhumal said that following Modi’s instructions he would target the drug, liquor, forest, land and transfer mafias operating in the state under the protection of the Congress regime.

When asked whether he was encountering any factionalism within his own party with workers owing allegiance to Union health minister J P Nadda and former chief minister Shanta Kumar, both of whom had chief ministerial aspirations before the BJP chose him, working at cross purposes, Dhumal said everyone was working for the “lotus: (the BJP’s symbol). “National President Amit Shah has already given a message to all leaders and workers that indiscipline will not be tolerated,” he added.

Dhumal also took a shot at the Congress’ national leadership for not turning up to support Virbhadra Singh’s election campaign. “The Congress national leadership has already conceded defeat and wants Virbhadra Singh to take all the discredit for the forthcoming result.”

When asked how will he improve the poor road infrastructure in the state and fulfill his dream of railroad to Leh via Himachal Pradesh, Dhumal said that the Modi government has already come to his aid by planning to invest Rs 70,000 crore for road and bridge infrastructure. “The Modi government had sanctioned Rs 329 crore to the state for preparing detailed project reports for 69 national highway roads and 64 bridges but the Virbhadra government did not get them ready. If elected, we will make this a priority as this will help tourism industry and generate economic activity and jobs,” Dhumal said.

But he repeated that his first priority is to restore the primacy of law so that heinous acts such as the Khotkhai rape case are not repeated. His reference is to the rape and murder of a 16-year-old schoolgirl in Shimla’s Khothai area in July.

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पश्चिम बंगाल में माकपा के 34 वर्षों के लाल दुर्ग को ढाहने वाली तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल के राजनीतिक सत्ता तक पहुंचाने में मुकुल राय की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती रही है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुकुल राय की गणना तृणमूल कांग्रेस के चाणक्य के रूप में की जाती है.
श्री राय को ममता बनर्जी की लोकप्रियता को हथियार बना कर माकपा के मुकाबले राज्य के प्रत्येक मतदान केंद्र पर अपना संगठन व कैडर तैयार करने का श्रेय जाता है और इसी के बदौलत राज्य की सत्ता पर तृणमूल कांग्रेस काबिज हुई.
कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अति विश्वस्त माने जाने वाले श्री राय और सुश्री बनर्जी के बीच 2016 के विधानसभा चुनाव के पहले ही दूरियां बढ़ने लगी थीं. सारधा चिटफंड घोटाले से उनके नाम जुड़ने, नारद कांड में संलिप्तता के आरोप और पार्टी में उनकी जगह मुख्यमंत्री के भतीजे व सांसद अभिषेक बनर्जी को दूसरा स्थान देने जैसे मुद्दों ने मुकुल और ममता के बीच दूरियां बढ़ा दीं और अंतत: श्री राय नेे भाजपा का दामन थाम लिया.
विधानसभा चुनाव में हुए पराजित, बने राज्यसभा सांसद
2001 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वह जगद्दल से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार बने, लेकिन 56,741 के साथ दूसरे स्थान पर थे. हालांकि 2001 के विधानसभा चुनाव में वो खुद चुनाव हार गये, लेकिन तृणमूल कांग्रेस 60 सीट जीतने में कामयाब रही. 2006 में हुए राज्यसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया. 2008 में उन्हें पार्टी का अखिल भारतीय महासचिव बनाया गया.
2008 में वाममोरचा ने न्यूक्लियर डील पर तकरार के चलते कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए से समर्थन वापस ले लिया था. ऐसे में कांग्रेस को सूबे में नये साझीदार की जरूरत थी. 2009 में दोनों दलों में गठबंधन हो गया. तृणमूल ने इस चुनाव में 19 सीट जीतने में कामयाबी हासिल की. इसी दम पर मुकुल राय को केंद्र सरकार में जहाजरानी का राज्यमंत्री बनाया गया.
ममता के बदले बने रेल मंत्री, दिनेश त्रिवेदी को लेकर तकरार
2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की जीत के बाद ममता बनर्जी बतौर मुख्यमंत्री बंगाल लौट गयीं. उन्होंने रेल मंत्री का पद अपने सबसे विश्वस्त सिपहसालार मुकुल राय को सौंपा. उन्हें रेल राज्यमंत्री का नया कार्यभार सौंपा गया.
मुकुल राय इस पद पर लंबे समय तक टिक नहीं पाये. 11 जुलाई 2011. गुवाहाटी-पुरी एक्सप्रेस असम में पटरी से उतर गयी. तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रेल मंत्री मुकुल राय को निर्देश दिया कि वो घटनास्थल का दौरा करें. श्री राय ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया. अगले ही दिन हुए कैबिनेट विस्तार में उनसे रेल मंत्री का कार्यभार छीन लिया गया.
उनकी जगह पर तृणमूल कांग्रेस के ही दिनेश त्रिवेदी को नया रेल मंत्री बनाया गया. मार्च 2012 में आये रेल बजट ने तृणमूल और सरकार के भीतर चल रही कलह को सतह पर ला दिया. ममता बनर्जी रेल बजट से पहले ही घोषणा कर चुकी थीं कि यात्री किराये में किसी भी तरह की बढ़ोतरी नहीं होगी. दिनेश त्रिवेदी ने रेल बजट में यात्री किराया बढ़ाकर ममता की नाफरमानी की. ममता बनर्जी ने दिनेश त्रिवेदी से पद वापस लेने में कोई कोताही नहीं बरती. 20 मार्च 2012 को मुकुल रॉय को फिर से रेल मंत्री की कुर्सी दी गयी. इस बीच सरकार और ममता के बीच तनाव काफी बढ़ गया. ममता ने 21 सितंबर 2012 कांग्रेस से गठबंधन तोड़ दिया.
ना सूबे में उनकी सरकार पर कोई ख़ास असर नहीं डालता था. 21 सितंबर 2012 को तृणमूल ने कांग्रेस के साथ गठबंधन तोड़ दिया. इस तरह मुकुल राय का बतौर रेल मंत्री कार्यकाल खत्म हुआ.
एक रेलवे कर्मचारी के बेटे के लिए यह सियासी सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा. पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के कांचरापाड़ा स्थित श्री राय का जन्म 17 अप्रैल 1954 को हुआ  था. ऋषि बंकिमचंद्र डिग्री कॉलेज में श्री राय ने रसायन शास्त्र में बीएससी की पढ़ाई की, लेकिन उनकी दिलचस्पी थी राजनीति में थी. वह कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई से जुड़ गये. इसी रास्ते से युवा कांग्रेस में पहुंचे. 1995 में इनका संपर्क हुआ ममता बनर्जी के साथ हुआ और वह उनके संसदीय क्षेत्र में संगठन का काम करने लगे.
1997 में बनी तृणमूल कांग्रेस में वो नंबर दो की पोजीशन पर थे और जल्द ही वह नयी दिल्ली में पार्टी का चेहरा बन गये और 2006 में उन्हें महासचिव बनाया गया.
इस तरह ममता-मुकुल के बीच बढ़ने लगी दूरी
2011 में जब ममता बनर्जी बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं तो पार्टी की सारी कमान मुकुल राय के हाथ में आ गयी. वो सूबे में नंबर दो थे. सत्ता के गलियारों में उनकी धमक साफ सुनी जा सकती थी.
स्थितियां बदलीं 2015 में. विधानसभा चुनाव में महज साल भर का समय बाकी था और सरकार के कई मंत्री सारधा चिटफंड घोटाले में घिर गये. सीबीआई जांच की तलवार पार्टी के नेताओं पर लटकने लगी.
मुकुल राय का नाम भी इस घोटाले में आ रहा था. सरकार सारदा चिटफंड से उबर ही रही थी कि नारदा स्टिंग ने एक बार फिर से तृणमूल सरकार के दौरान हुए भ्रष्टाचार को लोगों को सामने रख दिया. मुकुल राय एक बार फिर से आरोपों के घेरे में थे. इस बीच राजनैतिक गलियारों में खबर उठी कि मुकुल राय तृणमूल के कुछ नेताओं के साथ नई पार्टी बनाने की फिराक में हैं.
विधानसभा चुनाव सिर पर था. ममता बनर्जी कोई रिस्क नहीं लेना चाह रही थीं. फिर मुकल राय पर भ्रष्टाचार के आरोप भी थे. ममता बनर्जी ने उन्हें पार्टी महासचिव के पद से हटाने में देरी नहीं लगायी और संगठन की कमान अपने हाथ में ले ली. 2016 में ममता और मुकुल के बीच चल रही तकरार कुछ सुलझती हुई नजर आई.
मुकुल राय को फिर से संगठन में लाया गया. उनके लिए उपाध्यक्ष का नया पद बनाया गया लेकिन वो भरोसा फिर से कभी कायम नहीं हो पाया. पिछले कई महीने से अफवाह बार-बार उठ रही थी कि मुकुल राय तृणमूल छोड़कर बीजेपी ज्वॉइन कर लेंगे. ममता बनर्जी भी इससे बेखबर नहीं थीं. चार सितंबर को उन्होंने मुकल रॉय को संसदीय सलाहकार कमेटी से हटा दिया दिया.
17 सितंबर को ममता ने पार्टी में उपाध्यक्ष के पद को खत्म कर दिया. इस तरह बिना इस्तीफा दिए मुकुल राय की तृणमूल कांग्रेस के संगठन से विदाई हो गयी.  अंतत: उन्होंने  25 सितंबर, 2017 को तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया, बाद में उन्हें  पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए छह साल के लिए पार्टी का निलंबित कर दिया  गया.
उन पर केंद्रीय वित्त  मंत्री अरुण जेटली और भाजपा के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय जैसे भाजपा  नेताओं से मुलाकात के आरोप लगे. उन्होंने 11 अक्तूबर, 2017 को राज्य सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. आखिरकार 3 नवंबर को मुकुल राय ने दिल्ली में बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर ली.

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गुजरात विधानसभा चुनाव में विजयपताका फहराने के लिए भाजपा कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाह रही है. इसके लिए पार्टी गुजरात के मुसलिम वोटरों को भी अपने पाले में करने के लिए हर प्रयास कर रही है. मुंबई से 500 मुस्लिम पार्टी कार्यकर्ताओं की टीम सूरत कूच के लिए तैयार है. यह टीम वहां घर-घर जाकर लोगों को पार्टी के पक्ष में प्रचार करेगी.

5 नवंबर को टीम सूरत जाएगी

इन कार्यकर्ताओं को सूरत में प्रचार के लिए बाकायदा प्रशिक्षित किया जा रहा है. मुंबई के बांद्रा स्थित कार्यालय में कैडर को इसके लिए तैयार किया जा रहा. भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा के उपाध्यक्ष हैदर आजम ने बताया कि पहले चरण में 250 कार्यकर्ता 5 नवंबर को मुंबई से सूरत रवाना हो जाएंगे. उन्होंने बताया कि सूरत में कुल 12 विधानसभा सीटें हैं. 25000-50000 मुस्लिम मतदाताओं वाला क्षेत्र हमारी प्राथमिकता में है. हम हर बूथ पर जाकर वहां स्थित मदरसा के ट्रस्टी से मिलकर स्थानीय मुद्दों को जानकर उसके हिसाब से कैंपेन चलाएंगे.

मुस्लिम प्रत्याशी न होने से निराश नहीं

उन्होंने कहा कि हालांकि हमारे सामने एक बड़ी चुनौती है भाजपा की सूची में मुस्लिम प्रत्याशियों का न होना, लेकिन इससे हमारे कार्यकर्ताओं के मनोबल पर कोई असर नहीं पड़ता है. सीट का निर्धारण संसदीय बोर्ड करता है. इसमें कोई कुछ नहीं कर सकता. एक कार्यकर्ता के लिए सिर्फ पार्टी की जीत मायने रखती है. हर कार्यकर्ता सिर्फ जीत के लिए काम कर रहा है.

शिक्षा, रोजगार, व्यापार और सुरक्षा मुख्य मुद्दा

हैदर आजम ने बताया कि मुस्लिमों के लिए शिक्षा, रोजगार, व्यापार और सुरक्षा हमारे कैंपेन में मुख्य मुद्दे हैं. उन्होंने कहा कि अन्य लोग गोरक्षा जैसी बातों को लाकर मुख्य मुद्दे के लोगों को भटकाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि पिछले 15 वर्षों से गुजरात पूरी तरह से दंगा मुक्त रहा है. यहां मुस्लिमों के लिए व्यापार करने का बेहतर माहौल है.

अभियान अब तक सफल

बीजेपी की महिला मोर्च की एक कार्यकर्ता ने कहा कि हम लोगों को भाजपा का समर्थन करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. हमारा अभियान अब तक सफल रहा है. उन्होंने अपनी रणनीति के बारे में बताया कि हम प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों की रिपोर्ट तैयार कर उसे उम्मीदवारों को देते हैं, ताकि उसके हिसाब से ही कैंपेन चलाया जा सके.

 

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आम आदमी पार्टी के ओखला से विधायक अमानतुल्ला खान का निलंबन बहाल कर दिया गया है. कुमार विश्वास को बीजेपी एजेंट बताने पर पहले पोलिटिकल अफेयर कमेटी से हटाने के साथ-साथ पार्टी से अमानतुल्ला खान को निलंबित कर दिया गया था.

अमानतुल्ला खान के बयान को लेकर खड़े हुए विवाद का असर कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल के रिश्तों पर भी दिखा. विवादित बयान के बाद कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल के बीच कथ‍ित तौर पर शीत युद्ध भी देखने मिला था.

भड़क गए कुमार विश्वास

आप विधायक अमानतुल्ला की वापसी पर कुमार विश्वास ने भड़क गए हैं. उन्होंने कहा है कि अमानतुल्ला सिर्फ एक मुखौटा है, मैं नीम की तरह कड़वी दवा हूं. मैंने तो बैक टू बेसिक का नारा दिया था, लेकिन कुछ लोगों को पसंद नहीं आया है. दो नवंबर को जो बैठक है उसके वक्ताओं में मेरा नाम नहीं है.

विश्वास ने कहा कि राजनीतिक साइड लाइन की परंपरा पुरानी है, पहले मयंक गांधी और अंजलि दमानिया के साथ भी ऐसा ही हुआ था. मेरे लिए अमानतुल्ला या राज्यसभा मुद्दा नहीं है. कई राष्ट्रहित के मुद्दों पर मैं पार्टी में अकेला पड़ गया था.

उन्होंने कहा कि मेरे दरवाजे से राज्यसभा की कई सीटें वापस गई हैं, दूसरी पार्टी से आए लोगों की वजह से हम भी बीजेपी और कांग्रेस की तरह बन रहे हैं. हमें पीछे लौटकर देखना होगा, मेरे ऊपर निजी हमलों से कुछ नहीं होगा. उन्होंने कहा कि मैं बेहतर उम्मीदवार हूं, हमें विकल्प की राजनीति के लिए चुना था.

विश्वास ने कहा कि केजरीवाल से बात हुई है या नहीं ये मैं नहीं बताऊंगा. नेशनल काउंसिल में बोलने वाले वक्ताओं में मेरा नाम नहीं, कार्यकर्ता चाहेंगे तो जरूर बोलूंगा.

उस वक्त हालात इतने बिगड़ गए थे कि अमानतुल्ला खान के बयान से नाराज कुमार विश्वास को मनाने के लिए मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल को आधी रात गाजियाबाद स्थ‍ित कुमार विश्वास के घर  भी जाना पड़ा था.

कपिल मिश्रा ने साधा निशाना

अमानतुल्ला खां का निलंबन खत्म होने पर आप विधायक कपिल मिश्रा ने कुमार विश्वास पर निशाना साधा है. कपिल मिश्रा ने ट्वीट किया,”अमानतुल्ला का निलंबन खत्म, मतलब जो भी अमानत ने @DrKumarVishwas के बारे में कहा उसे अब सच माना गया”.

कपिल मिश्रा ने कहा कि मैंने बार बार कहा आप इनके भ्रष्टाचार को कितना भी छिपा लो, ये आपको साजिशो में फंसायेंगे. भैया @DrKumarVishwas आपको अब खुलकर सच कहना होगा.

भैया @DrKumarVishwas – “डर के आगे जीत है” – अगर आप घुटने टेकने की जगह वीरता से सत्य के लिए खड़े होंगे तो मेरे जैसा हर कार्यकर्ता आपके साथ है.

अमानतुल्ला ने लगाए थे आरोप

30 अप्रैल को बयान जारी करने के बाद ‘आज तक’ से बातचीत में विधायक अमानतुल्ला खान ने कुमार विश्वास पर तीन बड़े आरोप लगाए थे. खान ने कहा था कि कैबिनेट मंत्री के घर में चार विधायकों की बैठक हुई थी.

वहीं कुमार विश्वास बीजेपी के इशारे पर पंजाब और एमसीडी के चुनाव में कैम्पेन करने नहीं आए थे. साथ ही टिकट बंटबारे में कुमार विश्वास मौजूद थे, लेकिन अब सवाल उठाकर एक षड्यंत्र रचा जा रहा है.

इस बयान पर हुआ था विवाद

जिस बयान से विवाद खड़ा हुआ था उसमें अमानतुल्ला खान ने आरोप लगाते हुए कहा था कि ‘कुमार विश्वास आम आदमी पार्टी को हड़पना चाहते हैं और तोड़ना चाहते हैं. कुमार अपने घर में विधायकों को बुलाकर यह कह रहे हैं कि मुझे पार्टी का संयोजक बनवाओ, नहीं तो बीजेपी में चलो. बीजेपी हर एक को 30 करोड़ देने के लिए तैयार है.’

विश्वास पर पार्टी तोड़ने का गंभीर आरोप

जामिया से AAP विधायक ने कहा था कि मुझे लगता है ये सब बीजेपी के इशारे पर हो रहा है और इस काम के लिए इन्होंने 4 विधायक छोड़े हुए हैं. ये चारों विधायक AAP के विधायकों को कुमार विश्वास के घर ले जाते हैं, इस बात की तस्दीक AAP के तमाम विधायकों ने की.