ओपिनियन

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आई आई एन डेस्क नई दिल्ली –

दिल्ली चुनाव में वोट करने वालीं सेक्स वर्कर्स चाहती हैं कि दिल्ली में ऐसी सरकार बने जो प्रॉस्टिट्यूशन को वैध करवाने का मुद्दा उठाए। जीबी रोड इलाके की लगभग 1500 सेक्स वर्कर्स ने बीते दिन उत्साह के साथ वोट डाला। नाम न छापने की शर्त पर एक सेक्स वर्कर ने बताया कि हमें ऐसी स्थिर सरकार चाहिए जो हमारे जीवन में स्थिरता लाए, हमारे प्रफेशन को वैध करने की पहल करे।

वोट डालने के बाद उन्हीं की साथी मोना ने कहा कि प्रॉस्टिट्यूशन के वैध हो जाने के बाद सरकार से मिलने वाले लाभ हम तक पहुंचने लगेंगे। बताया गया कि 2008 में काफी प्रयास के बाद मतदाता सूची में सेक्स वर्कर्स के नाम जोड़ने का काम गंभीरता से शुरू हुआ था। खास बात यह है कि इनकी अपनी कुछ मांगें हैं, जिन्हें इन्होंने प्रत्याशियों के सामने रखा था। इन मांगों में हेल्थ कार्ड, बच्चों के लिए हॉस्टल सहित स्कूल, जॉब लाइसेंस, मकान, साफ-सफाई है।

हालांकि, यहां सेक्स वर्कर्स की बड़ी तादाद ऐसी भी है जिन्हें अभी तक मतदान का अधिकार नहीं मिल पाया है। इस बाबत इन पर जरूरी पहचान पत्र न होने जैसे कई कारण हैं। जीबी रोड स्थित कोठे मटियामहल और बल्लीमारान विधानसभा क्षेत्र में आते हैं। एक महिला ने बताया कि पिछले लोकसभा चुनाव में यहां की 90 फीसद मतदाताओं ने मतदान किया था। इस बार भी मतदान केंद्र पर गजब की सहभागिता देखने को मिली।

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आई आई एन डेस्क नई दिल्ली –

एग्जिट पोल के मुताबिक अरविंद केजरीवाल दिल्ली के अगले मुख्यमंत्री होंगे। हाल के चुनावों में सबसे भरोसेमंद एग्जिट पोल देने की पहचान बनाने वाले चाणक्य के मुताबिक केजरीवाल की पार्टी को 70 सीटों वाली विधानसभा में 48 सीटें मिल सकती हैं। चाणक्य के मुताबिक यह आंकड़ा 51 तक भी जा सकता है। दूसरी तरफ बीजेपी 22 सीटों पर ही सिमट सकती है और कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाएगी। चाणक्य के मुताबिक आम आदमी पार्टी को 43 पर्सेंट वोट मिलने का अनुमान है जबकि बीजेपी को 37 पर्सेंट वोट मिल सकता है। इस पोल के मुताबिक कांग्रेस को 13 पर्सेंट वोट पर ही संतोष करना पड़ सकता है।

नीलसन, सी-वोटर, सिसरो और न्यूज नेशन के एग्जिट पोल के मुताबिक आम आदमी पार्टी को कुल 42 सीटें मिल सकती हैं। इतनी सीटें दिल्ली में सरकार बनाने के लिए पर्याप्त हैं। इन एग्जिट पोल के मुताबिक बीजेपी और उसकी सहयोगी अकाली को 29 सीटें मिल सकती हैं। 70 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस महज 3 सीटों पर सिमट सकती है।

चाणक्य के मुताबिक केजरीवाल दिल्ली में 53 पर्सेंट लोगों की पसंद हैं जबकि किरन बेदी 37 पर्सेंट लोगों की ही पसंद हैं। मतलब सीएम के रूप में किरन बेदी के मुकाबले केजरीवाल को 17 पर्सेंट ज्यादा लोग पसंद करते हैं। इंडिया टुडे सिसरो के मुताबिक आप को 35 से 43 सीटें मिल सकती हैं। इसी पोल के मुताबिक बीजेपी 23 से 29 और कांग्रेस 3-5 पर ही सिमट कर रह सकती है। नीलसन ने आप को 43, बीजेपी को 26 और कांग्रेस को 3 सीटें मिलने का अनुमान बताया है। नीलसन ने बीजेपी को 32 पर्सेंट वोट और आम आदमी पार्टी को 37 पर्सेंट वोट मिलने का अनुमान बताया है। आप को 8 पर्सेंट वोट का फायदा होते दिख रहा है। कांग्रेस एक बार फिर से तीसरे नंबर पर खिसकती दिखी रही है। कांग्रेस को 6 पर्सेंट वोट का नुकसान हुआ है।

चाणक्य एग्जिट पोल के मुताबिक इस चुनाव में दिल्ली के सभी वर्गों के मतदाताओं से आम आदमी पार्टी को समर्थन मिला है। चाणक्य के अनुसार 71 पर्सेंट मुस्लिमों ने आम आदमी पार्टी को वोट किया। इसके साथ ही सभी जातियों में भी केजरीवाल को भारी समर्थन मिला है। एग्जिट पोल के मुताबिक युवा वर्ग में भी केजरीवाल की लोकप्रियता सिर चढ़कर बोली।

पिछली बार के एग्जिट पोल में चाणक्य ने आम आदमी को 31 सीटें दी थीं और उसे 28 सीटों पर जीत मिली थी। बीजेपी को इसने 29 सीटें मिलने का अनुमान बताया था और जीत 31 पर मिली थी। कांग्रेस को चाणक्य ने 10 सीटें मिलने का अनुमान बताया था और उसे 8 मिली थीं। टाइम्स नाउ ने आम आदमी पार्टी को 11, बीजेपी को 31 और कांग्रेस को 24 सीटें मिलने का अनुमान बताया था। एबीपी नीलसन ने आप को 15, बीजेपी को 37 और कांग्रेस को 16 सीटें दी थीं। आज तक ने आप को 6, बीजेपी को 41 और कांग्रेस को 20 सीटें मिलने का दावा किया था।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदाताओं ने वोटिंग को लेकर शानदार उत्साह दिखाया। चुनाव आयोग को मिली जानकारी के मुताबिक इस बार दिल्ली में 67% वोटिंग हुई। सुबह वोटिंग की शुरुआत धीमी रही लेकिन 9 बजे के बाद पोलिंग बूथों पर मतदाताओं की लंबी लाइनें दिखने लगीं। दिसंबर 2013 के दिल्ली चुनाव में 66 पर्सेंट वोटिंग हुई थी। वोटिंग खत्म होने के बाद अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट किया, ‘हमने अपना काम ईमानदारी और निःस्वार्थ भाव से किया। अब फल भगवान के हाथों में है।’

सभी पार्टियों ने दिल्ली के मतदाताओं से वोट करने की अपील की थी। सभी पार्टियां इस मुद्दे पर एक मत हैं कि दिल्ली को खंडित जनादेश नहीं मिलना चाहिए। दिसंबर 2013 के चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से मिल रही कड़ी टक्कर के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार सुबह मतदाताओं से भारी संख्या में निकल वोटिंग करने की अपील की थी।

इस बार का दिल्ली चुनाव केजरीवाल बनाम किरन बेदी रहा। पार्टी कैंडिडेट्स की पहचान के मुकाबले केजरीवाल और बेदी की शख्सियत ज्यादा अहम रही। कभी साथ में आंदोलन करने वाले किरन और केजरीवाल चुनावी कैंपेन में एक दूसरे पर हमलावर रहे।

अरविंद केजरीवाल ने लगातर ट्वीट कर पोलिंग बूथों पर धीमे मतदान के आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि लोगों को वोट डालने में कुछ ज्यादा ही इंतजार करना पड़ रहा है। केजरीवाल ने कहा कि कहीं-कहीं को दो-दो घंटे लाइन में लगना पड़ रहा है।

दिसंबर 2013 के चुनाव में खंडित जनादेश के बाद केजरीवाल ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई थी लेकिन उन्होंने 49 दिनों में ही इस्तीफा दे दिया था। इस बार के चुनाव में उन्होंने दिल्ली की जनता से पूर्ण बहुमत की मांग की है। किरन बेदी अपने जीवन का पहला चुनाव लड़ रही हैं और उन्होंने दिल्ली को पूरी तरह से बदलने का वादा किया है।

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आई आई एन डेस्क नई दिल्ली-

2006 में मनरेगा का लागू हिना गरीबों एक वरदान सामान था इससे भारत के एक बड़े गरीब वर्ग को न सिर्फ 2 समय की रोटी का अधिकार मिला, बल्कि उनके जीवन स्तर में भी बेहतरी आई।

2006 में 200 पिछड़े जिलों में इसकी शुरुआत होने के महज 2 सालों के अंदर ही यह देश के सभी जिलों में लागू हो गया। गरीबों को रोजगार उपलब्ध कराने और जिंदगी की को एक नई दिशा देने के लिए इसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा की गई, लेकिन अब इस पर तलवार लटक रही है।

मनरेगा देश की नीतियों में एक बुनियादी बदलाव का प्रतीक है। इस कानून के तहत भारत के ग्रामीण इलाकों में मजदूरों को 100 दिन के रोजगार को संवैधानिक अधिकार बनाया गया। इसके तहत किसी भी ग्रामीण को जरूरत पड़ने पर किसी लोक निर्माण परियोजना में काम दिया जा सकता है।

कई स्टडी से यह साफ हुआ है कि इस कानून से ग्रामीण मजदूरी और गरीबी पर सकारात्मक असर पड़ा, रोजगार के लिए पलायन रुका है, महिलाओं और एससी-एसटी का सशक्तीकरण हुआ है, ग्रामीण आधारभूत ढांचे का विकास हुआ है। इस कार्यक्रम की वजह से स्त्रियों और पुरुषों के न्यूनतम मजदूरी के अंतर में भी कमी आई है। महिलाओं को इसकी वजह से न्यूनतम मजदूरी पुरुषों के बराबर मिलने लगी है लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद इस योजना पर पर्याप्त रूप से ध्यान नहीं दिया जा रहा है

 

इस कार्यक्रम के लिए सबसे बड़ी समस्या बकाया मजदूरी बनती जा रही है जो इस समय करीब 75 प्रतिशत हो चुकी है। इसलिए, अच्छे परिणामों के बावजूद मरनेगा का भविष्य अनिश्चित है। मौजूदा सरकार इसे लेकर कोई उत्साह नहीं दिखा रही है। संयोगवश योजना आयोग की जगह लेने वाले नीति आयोग में जिन 2 अर्थशास्त्रियों की नियुक्ति की गई वे दोनों ही सामाजिक सुरक्षा वाले अन्य कार्यक्रमों समेत मनरेगा के मुखर आलोचक रहे हैं।

मौजूदा सरकार मनरेगा को फिर से 200 जिलों तक सीमित करना चाहती है और इसके लिए सभी प्रदेशों (बीजेपी शासित समेत) को आवंटित की जाने वाली धनराशि में भी कटौती की गई है। सरकार ने कार्यक्रम के तहत मैटेरियल कम्पोनेंट का अनुपात भी बढ़ा दिया है, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा ही मिलेगा।

 

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आई आई एन डेस्क नई दिल्ली-
एक दिन पहले खुद में ‘बीजेपी की सरकार बनाने और गिराने’ की ताकत बताने वाले बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने अपने बयान से पलटी मार ली है। उन्नाव से बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने नरेंद्र मोदी की ‘सबका विकास’ करने की राजनीति की तारीफ की। साक्षी महाराज ने मोदी को ‘दैवीय शक्ति’ बताया। उन्होंने कहा कि मीडिया ने उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया और वह तो मोदी के सिपाही हैं।

साक्षी महाराज ने कहा, ‘मैं कैसे सरकार बना और गिरा सकता हूं? ऐसा अहंकार किसी मूर्ख को भी शोभा नहीं देता…मोदी भारत की दैवीय शक्ति हैं। मैं उनका सिपाही हूं। वह (मोदी) कोई सामान्य व्यक्ति नहीं बल्कि वह दैवीय शक्ति हैं। देश की तरक्की के लिए उनके पास जो विचार हैं और दुनिया में मोदी जी की जो जगह है, वह किसी साधारण मनुष्य के लिए संभव नहीं है।’

साक्षी महाराज ने कहा कि हिंदू संगठनों का एजेंडा राम मंदिर है और उसके लिए अभी इंतजार करना पड़ सकता है क्योंकि सरकार अभी विकास पर ध्यान केंद्रित कर रही है। साथ ही साक्षी महाराज ने यह भी कहा कि मोदी जी भी अयोध्या में विवादित जगह पर राम मंदिर का निर्माण चाहते हैं। एक समाचार एजेंसी को दिए गए इंटरव्यू में साक्षी महाराज ने कहा कि मोदी को इकनॉमी के साथ-साथ हिंदू एजेंडा पर भी ध्यान देना चाहिए।

बीजेपी सूत्रों का कहना है कि दिल्ली चुनाव के बाद पार्टी साक्षी महाराज के खिलाफ ऐक्शन ली सकती है। पार्टी से साक्षी महाराज से कहा है कि जितना जल्दी हो सके वह डेमेज कंट्रोल करें और सुनिश्चित करें कि उनके बयानों के चलते पार्टी को शर्मिंदगी ने उठानी पड़े।

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आई आई एन डेस्क नई दिल्ली –
 इस बार हिंदुत्व ब्रिगेड 14 फरवरी यानी वैलंटाइंस डे को यादगार बनाना चाहती है। इस मौके पर हिंदू महासभा ने नया पासा फेंका है। उसका कहना है कि इस मौके पर अलग-अलग धर्मों के लोगों के आपस में विवाह का खुलकर स्वागत किया जाएगा। हालांकि, इसके लिए एक शर्त है। गैर-हिंदू पार्टनर को ‘घर वापसी’ करनी होगी यानी हिंदू बनना पड़ेगा।

अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्र प्रकाश कौशिक का कहना है कि 14 फरवरी को प्रेम विवाह दिवस की तरह मनाया जाएगा और यह भी घर वापसी का हिस्सा होगा। उन्होंने बताया, ‘मुस्लिम या ईसाई पार्टनर की घर वापसी शादी से एक दिन पहले की जाएगी। इसके लिए हम कपल्स से एक दिन पहले सूचना देने को कह रहे हैं ताकि घर वापसी यानी फिर से धर्मांतरण के लिए पूरी व्यवस्था कर सकें।’

 

हिंदू महासभा ने हाल में महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की मूर्ति को देशभर में लगाने की मांग की थी। कौशिक ने कहा कि वैलंटाइंस डे उन लोगों के लिए ‘प्रेम परीक्षा’ होगी, जो अलग-अलग धर्मों का पालन करते हैं। उन्होंने बताया, ‘लव जिहाद के कई मामले हैं। अगर लड़का वाकई में लड़की से प्रेम करता है, तो उसे वह धर्म अपना लेना चाहिए, जो उसके पूर्वजों का था।’ लव जिहाद का मतलब मुसलमान पुरुषों की तरफ से हिंदू लड़कियों को धर्मांतरण के लिए अपनी तरफ आकर्षित करने से है।

महासभा ने इस दिन के लिए 6 टीमें तैयार की हैं। इन टीमों को राष्ट्रीय राजधानी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसे जोड़ों की पहचान करने की जिम्मेदारी मिली है, जो इस ऑफर का उपयोग कर सकते हैं। कौशक के मुताबिक, शांतिपूर्ण तरीके से धर्मांतरण के लिए तीन पुजारियों को तैनात किया जाएगा। साथ ही, जरूरत पड़ने पर और पुजारियों को बुलाया जा सकता है।

आई आई एन डेस्क लखनऊ –

दिल्ली विधानसभा चुनाव को देश एक रिऐलिटी शो की तरह टीवी पर देख रहा है। विभिन्न चैनलों पर इसकी रोचक खबरें आ रही हैं, चुनाव प्रचार के दृश्य दिखाए जा रहे हैं, गर्मागर्म भाषण और बहसें हो रही हैं। राजधानी के लोग भी इसका असली मजा टीवी पर ही ले रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में पूरे देश की ही राजनीति टीवी और सोशल मीडिया इवेंट में बदलती गई है, लेकिन दिल्ली में ऐसा खास तौर पर हो रहा है। संभवत: महानगरीय चरित्र वाले देश के इस एकमात्र राज्य के लिए यह एक बाध्यता हो। राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति भी यहां कुछ उसी हिसाब से बनाई है। वैसे दिल्ली असेंबली का चुनाव इतना ज्यादा हाई-प्रोफाइल पहले कभी नहीं हुआ था।

शायद ही कभी प्रधानमंत्री और समूचे केंद्रीय मंत्रिमंडल की सक्रियता इस छोटे से चुनाव में देखी गई हो। और तो और, इस बार बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री तक चुनाव प्रचार में जुटे हैं और पार्टी के सौ से ज्यादा सांसद गली-गली घूम कर माइक पर हलो-हलो कर रहे हैं। बीच में अचानक अपनी रणनीति बदलते हुए बीजेपी ने जब किरन बेदी को अपना सीएम कैंडिडेट घोषित किया तो लगा कि दिल्ली में नरेंद्र मोदी की भूमिका सीमित रहने वाली है।

लेकिन अभी यहां पार्टी का जो हाल दिखाई दे रहा है, वह कहीं न कहीं उसका आत्मविश्वास डगमगाने का सूचक है। अव्वल तो पुराने दिग्गजों को किनारे कर किरन बेदी को लाने के फैसले में ही उसका असमंजस जाहिर होने लगा था, लेकिन अभी की हड़बड़ाहट से बीजेपी का यह डर जाहिर हो रहा है कि परिणाम अगर अनुकूल नहीं आए तो विपक्ष इसे केंद्र सरकार की अब तक की परफॉरमेंस पर जनता की प्रतिक्रिया के रूप में प्रचारित कर सकता है। पार्टी की घबराहट के पीछे एक और वजह देखी जा सकती है। वह है दिल्ली का बदलता सियासी चरित्र।

बीजेपी हो या कांग्रेस, राजधानी में दोनों का नेतृत्व विभाजन के समय यहां आकर बसे पंजाबी प्रवासी और स्थानीय कारोबारी तबकों के लोग ही संभालते रहे हैं। सत्ता पाने के लिए उन्हें झोपड़पट्टियों में रहने वाले कामगार वर्गों के समर्थन की जरूरत पड़ती थी, जो थोड़े-बहुत लेनदेन के जरिये उन्हें मिल जाता था। लेकिन नब्बे का दशक बीतते-बीतते दिल्ली की आबादी का ढांचा बदल गया। पहले दूर-दराज के इलाकों से केवल गरीब मजदूरों का पलायन होता था, पर अब शिक्षित मध्यवर्ग भी इस पांत में शामिल हो गया।

उदारीकरण ने दिल्ली में रोजी-रोजगार की नई संभावनाएं पैदा कीं और बाहर से आकर देखते-देखते यहां की स्थायी आबादी का हिस्सा बन गए नए प्रवासी समुदाय दिल्ली की राजनीति में अपना प्रतिनिधित्व चाहने लगे। शहर में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और निर्भया कांड के विरुद्ध उभरे जन विद्रोह में मुख्य भूमिका इसी तबके की थी। जाहिर है, यह तबका सिर्फ यहां की कुर्सियों पर बैठने वाले चेहरे नहीं, इस शहर का समूचा चाल-चलन बदलना चाहता है। स्थापित पार्टियों की मुश्किल यह है कि इस तबके की राजनीति अभी स्थिर नहीं हुई है और उनके जमे-जमाए टोटके इसको अपने साथ जोड़े रखने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं

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आई आई एन डेस्क नई दिल्ली –

करीब एक साल पहले दिल्ली में हज़ारों युवाओं ने कुछ ऐसा किया, जो उन्होंने पहले नहीं किया था। युवाओं ने डिनर पर अपने परिवार के साथ राजनीति पर चर्चा की। दिल्ली के लोगों के लिए राजनीति पर बहस करना नई बात नहीं है, लेकिन इस बार कुछ अलग था। इस बार दिल्ली के लोगों ने एक नई राजनीतिक पार्टी को मौका देने की सोची और उन्होंने कई बार अपनी गाढ़ी कमाई से पार्टी को चंदा भी दिया। कुछ महीने बाद ऐसे लोगों को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा, जब उनके दोस्तों और करीबी लोगों ने उनसे कहा- देखा हमने कहा था ना…

दिल्ली के कई लोगों का मानना है कि हमने अपने काम से उन्हें निराश किया है। इस साल मई में हमने दिल्ली के लोगें से इसके लिए माफ़ी मांगी। अगर मेरी माफी मांगने की बात आपने नहीं सुनी हो, तो मैं आपसे फिर से माफी मांगता है, जिससे हमारी बात आप तक साफ शब्दों में पहुंच सके। साफ-सुथरा, ईमानदार शासन और पारदर्शी फंडिंग के साथ आम आदमी पार्टी हवा के ताज़ा झोंके की तरह थी। हमने कभी झूठ नहीं बोला और कुछ छिपाया नहीं। लेकिन मैं ये भी मानता हूं कि हमारे काम से कुछ लोगों को ठेस भी पहुंची, क्योंकि आम आदमी पार्टी की जो छवि है, वो हम सबसे बड़ी है। लोगों को इस बात से ठेस पहुंची कि जिस पार्टी और आंदोलन के लिए उन्होंने इतना कुछ किया वो मैदान छोड़कर भागती दिखी। लोगों का ये भी मानना है कि मैंने दिल्ली के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा लोकसभा चुनाव लड़कर प्रधानमंत्री बनने के लिए दिया था। लेकिन ये गलत है।

मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा देने के फौरन बाद ही मैंने दिल्ली में फिर से चुनाव कराने की मांग की थी। अल्पमत की सरकार होने के बावजूद हमारे सरकार के काम करने की लोकप्रियता 71 फ़ीसदी थी। लेकिन दिल्ली के चुनाव में काफी देर हो रही थी। बाद में हमें एहसास हुआ कि हम कुछ ज़्यादा ही भरोसा कर रहे थे। ये एक ग़लती थी, जिसे हम मानते हैं। लेकिन अब हमें बीती बातों को भूलकर भविष्य पर ध्यान देना है। आखिरकार अगर लोगों ने हमें शासन करने का जनादेश दिया है, तो वो हमसे धैर्यपूर्वक काम करने की उम्मीद करेंगे। हाल ही में किसी ने कहा था- दिल्ली की एक राजनीतिक पार्टी के रूप में हम दिल्ली के लोगों के लिए क्या कर सकते हैं, वो ज़्यादा जरूरी है। हम इस बात को मानते हैं और इसे गंभीरता से लेते हैं।

आम आदमी पार्टी के मायने अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग हैं। कुछ लोगों के लिए ये एक ऐसी शक्ति है, जो चंद हाथों में पूंजी इकट्ठा न हो, इसके खिलाफ लड़ाई लड़ेगी और लोगों को को व्यवसाय करने में मदद करेगी। कुछ लोगों के लिए आम आदमी पार्टी सांप्रदायिक और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से अलग कुछ नई चीज है। ज़्यादातर लोगों के लिए आम आदमी पार्टी संविधान से मिले अधिकार और स्वतंत्रता के साथ जीवन व्यतीत करने का एक मौका है। पिछले चुनाव में हमने वादा किया था कि हम ये सुनिश्चित करेंगे कि व्यवसाय करने के लिए घूस और पुलिस वालों को हफ्ता न देना पड़े और कीमती राष्ट्रीय संसाधनों के खुल्लम खुल्ला चोरी से देश को बचाने का काम करेंगे।

हम सभी एक स्थायी और उत्तरदायी सरकार चाहते हैं। ऐसा माहौल चाहते हैं जहां रिश्वतखोरी न हो, ईमानदारी से लोग अपना काम कर सकें, हर बच्चे को एक बेहतर ज़िंदगी मिले और ये आश्वासन मिले कि वह सुरक्षित है।

आम आदमी पार्टी हो या न हो, केजरीवाल हो या न हो, हम ऐसा ही माहौल चाहते हैं। किसी भी समय लोगों की एक सरकार से इतनी ही चाहत होती है। आम आदमी पार्टी ने एक टीम और परिवार बनकर कई चुनौतियों का सामना किया है। इस परिवार में किसी भी तरह का सामाजिक या आर्थिक बंधन नहीं है। हम दिल्ली के लोग हैं और हम जानते हैं कि दिल्ली की समस्याओं को कैसे दूर किया जा सकता है। हम समझते हैं कि दिल्ली के लोग ये महसूस करना चाहते हैं कि उनकी सरकार उनके लिए काम कर रही है। हम समझते हैं कि दिल्ली के लोग चाहते है कि हम केंद्र सरकार के साथ मिलकर रचनात्मक काम करें। हम समझते हैं कि दिल्ली सरकार ईमानदार होने के साथ ही स्थिर भी होनी चाहिए, ऐसी सरकार जो पहले दिन से ही दिल्ली को दुनिया के दूसरे बड़े शहरों की बराबरी का बनाने को तैयार हो, ऐसी सरकार जो हर वर्ग के लोगों की सुने और उनकी जरूरतों के मुताबिक काम करे।

एक व्यक्ति के तौर पर हमें अपनी ताकत को कम नहीं आंकना चाहिए- हमारे नेताओं का काम हमारी सेवा करना है। हमें ऐसी सरकार की शक्ति को भी कम नहीं आंकना चाहिए, जो अपनी जनता को गले लगाती है और अपनी जनता पर भरोसा करती है। सरकार का काम सिर्फ भाषण देना और लोगों में असुरक्षा की भावना भरना नहीं है। सरकार का काम बेहतर भविष्य के लिए विकास को बढ़ावा देना, स्थिरता देना और लोगों को सुरक्षा देना है। रवींद्र नाथ टैगोर के शब्दों में कहे तो-ऐसी दुनिया जो छोटे-छोटे टुकड़ों में न बंटी हो।

हमारा एक विजन है दिल्ली को रिश्वतखोरी से मुक्त करना, ऩई कंपनियों, सेवाओं और निर्माण का केंद्र बनाना। दिल्ली व्यावसायिक विकास, स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा और महिला सुरक्षा के मामले में नए पैमाने तय करेगी। ये सब एक दिन में संभव नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों की सलाह से, साफ मंशा और जो हमसे अहसमत हैं, उनके साथ भी काम करने की प्रतिबद्धता से ये संभव हो सकता है। हमें यहीं से शुरुआत करनी है। वास्तविकता ये है कि हमारे जितने भी मतभेद हों- दिल्ली को बेहतर बनाने में हम साथ हैं। हम कदम दर कदम इस लक्ष्य को पा सकते हैं। आइए दिल्ली में सब साथ मिलकर चलें।

आने वाले चुनावों में मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए। मैं ये मानता हूं कि डटे रहने और जिनकी आप सेवा करना चाहते हैं, उनके प्रति ईमानदार रहकर स्थिरता की शुरुआत खुद से होती है। अपने अतीत से सबक लेना दिल्ली को विश्वस्तर का शहर बनाने में हमारे लिए मददगार साबित होगा। हमारा लक्ष्य साफ है और हम पूरे दिल से, अपने मकसद, अपने विज़न को पूरा करने के लिए काम करेंगे।

खत्म करने से पहले मैं अपने हज़ारों वॉलेंटियर्स का धन्यवाद देना चाहता हूं जो अपनी व्यस्त ज़िंदगी में से अहम समय पार्टी के लिए देते हैं। वे लोगों को विश्वास दिलाना चाहते हैं कि पारदर्शी फंडिंग के ज़रिए लड़कर भी चुनाव जीता जा सकता है। हर दिन मुझे आपका आशीर्वाद मिलता है। अक्सर हम युवाओं से कहते हैं कि नेता तुम ही हो कल के, लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूं। युवाओं की जरूरत आज के भारत को है। उनका समय आ गया है। ये एक ज़िम्मेदारी है जो सबको निभानी है। हमारा समय अभी है। अंत में मैं आपसे ये वादा कर सकता हूं कि मैं हार नहीं मानूंगा…

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं

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